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Saturday, 26 November 2016

Mujh mein tum

मुझ  में  तुम !!
तुम से वो सब कहना है .....
जो खुद से या खुदा से कहती हुं !
वो सब फर्माईशें और ख्वाहिशें  जो दिल को चाहियें ,
हर  तरकीब जो बस ज़हन में  चलती है !
सारे रंग दिखानें  है ,
जो सिर्फ मुझ को दिखते हैं !
उन सब बारिशों में भीगाना है,
जो बस मेरी आँखों  को भीगाती हैं !
जालाना है तुम को भी
उसी सेहरा में जो मेरी ,हर सांस को जलाता है !
मै  ज़मा देना चाहती तुम को उस सर्द बर्फ में,
जो मुझे ज़माती हैं वक्त के ठंडे लामहों में !
भाफ बना के उड़ा ले जाना है तुम को अपने साथ ,
अपनी आहों की आँधी में !
भहा देना है तुम को भी उसी गंगा में ,
जो मेरे हर पाप को बहा ले जाती है !
मिलवाना है तुम अपने भीतर के रावन से,
जिसे ग्यान है अपने अंत का लेकिन  फिर भी
एक युध किये जाता है !
सुनाऊंगी तुम आपनी हर अनकही कहानी ,!
और वो हर राग, जो मेरे ही सुरों से बना है
मैँ करवा  देना चाहती हुं तुम से खुद का सामना
उतर जाना चाहती हुं तुम में किसी रूह की तरहाँ !
मुझ में झांक लो आयीने  की तरहाँ मुझ  तुम में
ऊतरना  है अपनी  ही  तरहाँ .......मेरे गवाह बन जाओ  मेरे खुदा की तरहाँ  !!-saira°