मन, मस्तिष्क के द्वार अभी मैं खोल रही हुँ,
बुधीमानो के
घेरे में अपने तर्क को तोल रही हुँ!
सत्य अस्त्य
के बीच भवर में डोल रही हुँ,
नाव लीए
प्रेम प्यार की कोई माझी ख़ोज रही हुँ!
मन, मस्तिष्क के द्वार अभी मैं खोल रही हुँ,
समझाया है
सब ने जीवन का मतलब फिर क्यूँ कोई और अर्थ मैं ख़ोज रही हुँ??
जीवन
जी लेने का मोह नही है, पर माया का होना सोच रही हुँ!!
भगवान प्रेम
है,प्रेम ही पूजा,प्रेम की उपज तो मैं भी हूँ ना??
सब प्रेम है
आख़िर जग में...फिर क्यूँ??
इस का
अस्तित्व टटोल रही हुँ!!
मन, मस्तिष्क के द्वार अभी मैं खोल रही हुँ!!
कह तो दिया दीपक ने रात के अंधेरे को ही
बाटुंगा ,
फिर क्यूँ
उसी के सहरे जीवन पथ को खोज रही हुँ!!
बुना हुआ सा
स्वपन है जीवन,
धागों का और
छोर क्यूँ खोल रही हुँ
ऊन रिश्तों
की गर्म बहुत है क्यूँ ख़ुद को झींझोर रही हुँ,
खुला खुला
ये नील गगन है फिर क्यूँ अपना दम तोड़ रही हुँ!!
मन, मस्तिष्क के द्वार अभी मैं खोल रही हुँ!!-saira