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Monday, 15 December 2014

laad pyar ,dular

 वो उंगली पकड़ के चलाता था., कभी सर का  साया बन जाता था,,,!
जिसकी तनख्वाह से खिलोने और घर का राशन आता था.. !
वो जो छोटी बड़ी ज़िद को हमारी पूरा कर दीखलता था..!
घर का चूल्हा जलता था तो कभी वो हाथ भी जल जाता था.!!
 हल्दी चूना लगता था कभी हलवा बन के आता था!!
डर लगता था जब रातों को उस आँचल  में तेरा बचपन छुप जाता था..!!.
थक गया है, हार गया है ,और कुछ बीमार हुआ है,,,अब वो  हो बूढा गया है ...जाने क्यूँ अब बोझ है तुम पे? जो कभी माँ बाबा का  लाड़,प्यार, दुलार कहलाता था!
सारा नही थोड़ा ही दे दो.. जो तुम पे खर्चा  करते थे.!
जो बचपन में मान से  माँ बाबा ,,,लाड़ प्यार, दुलार कहलाता था

 याद रहे वो सर का साया भी कहलाता था!!- saira

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