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Thursday, 18 December 2014

शहादत का इन्साफ अभी बाकी है!!!!!

शहादत का इन्साफ अभी बाकी है!!!!!
कितनी दहशत दिल में ले के
मेरा फरिश्ता मर गया होगा,
वहशत का शिकार,
सोच से बीमार ,
शैतान देख के मेरे बच्चे
तेरा ज़हन भी सहम गया होगा !
सामने कौन है? मौत या दरिंदा कोई ?
खुदा को भी तुने पुकारा होगा ....
अम्मा! अब्बा ! का नाम भी आया होगा
कराहट में तेरी !!
मैं नहीं जानती कैसा होगा कलेज़ा
उस आदम के बच्चे का
जिसे तेरी मासुम आँख में
ख़ुदा भी नज़र नहीं आया होगा !
तेरे दर्द का अहसास है मगर ..
मैं जी नहीं सकती वो लम्हां जो तु जी गया
मगर ज़िन्दा रहेगा खौफ़ मुझ में तेरी नन्ही बहन ,भाई
और तेरे दोस्तों की खातिर ...के वो बच गये हैं
और अभी दरिंदगी भी जिंदा है ....
खुन के करतों में फतेह देखने वाले अभी जिंदा हैं !
बे लगाम , बे लिहाज़ जाने किस कौम के हैं ?
इनकी शिनाख्त अभी बाकि है !
इन्सान को इन्सान की पहचान अभी बाकि है !
"ओ फरिश्ते " तु खुदा के घर है, तो उसी नीद से जगा दे...
खेल उसकी जन्नत के आँगन में,
के शोर ओ कोराम मचा दे ...
उसका जागना अभी बाकि है
तेरी शहादत का इन्साफ अभी बाकी है !!-saira

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