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Sunday, 21 December 2014

रिश्ते...

रिश्ते
रिश्ते तब तक ही हैं जब तक हमारी मर्ज़ी से चलते हैं !
जहाँ तब तक ही रिश्ते रहते हैं
जब ज़रा उम्मीदों से बाहर का बहाव आया नहीं ,
कि वो बरसने लगते हैं किसी पुरानी छत की तरह ,
रिसने लगते हैं रिश्ते ,
जब वो चार दीवारी का सीला पन महसूस करना बंद कर देते हैं ,
हम कितने भी दरवाज़े खुले रखें,
मन के झरोखे बंद होने ही लगते हैं
और खुलने लगते हैं रिश्ते और उन धागों से बंधे लोग ,
आज़ाद होने लगते है ,अपने ही हाथ से बांधे हुए मन्नतों के धागों से ..
बड़ा अजीब होता है ये सवाल ,
जब हम कहते हैं कि लोग दूर क्यूँ हो जाते हैं ?
रिश्ते बदल क्यूँ जाते हैं ? लोग अलग क्यूँ हो जाते हैं,
बिखर क्यों जाते हैं? जब की सवाल का जवाब खुद होता है हमारे पास ....
वास्तव में हम स्वीकार नहीं कर पाते उस रिश्ते का बदलता रूप ,
नहीं स्वीकार कर पाते कि हमारे खिलाफ चला जाये वो ,
या नहीं चाहते की वो अपनी भी कोई जिद्द सामने रखे ,
हाँ ! सही भी है ना, कैसे कोई रिश्ता हमारी इच्छा के विपरीत जायेगा ?
वो तो हमारा है हम जैसा ही होगा ,साथ रहेगा तो हम सा ही रहेगा ,
या फिर सीली हुई दीवार की तरह किसी तूफ़ान वाले दिन में भरभरा के गिर जाएगा .
मर जायेगा ,
गिर जायेगा हमारे गरूर की तरह , हाँ रिश्ते रिसने लगते हैं ...
रोक थाम नहीं की जा सकती इस रिसने की ,
ये जो दिल की चार दीवारी है इसको भीतर छुपा तो सकती है ,
लेकिन बदलते मौसम की सर्दी गर्मी धुप और बारिश से बचा नहीं सकते ,
अज़ीब परिंदे हैं ये रिश्ते दिल के,
न कैद सहते हैं न आजाद रहते हैं !!-saira

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