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Monday, 30 March 2015

आज़ाद न कर !!

उम्र भर गुलामी कर लु मैं तेरी दोनों आँखों की ....
बस तु इतना कर के नज़र ए करम कहीं और न कर !
न सोच जमाना क्या कहने वाला है 
तु आईने पे कुछ गौर न कर..!
मैं यु भी तेरे इश्क का शाहकार हु ...
बस ठहर जा के कोई और महबूब इज़ाद न कर !
बहुत हुआ दिल का खिलौना करना
नाज़ुक चीज़ हैं कुछ ख्याल तो कर !
मैं नाम लिख दी तेरे मेरी छोटी सी ज़िन्दगी
तु कुछ और न कर मोहब्बत में इकरार तो कर !!
खुल्द के सफ़र पे जायेंगे सभी तनहा ही ..
मेरे पलकों में तब तक तो ठहर ..बे जा वक़्त बर्बाद न कर !!
आज.. दिल् ,जान ,चाहे तो रूह को काबिज़ कर ले ,,
मुझे अपनी ग्रिफ्त में रख यूं आज़ाद न कर !!- saira

Saturday, 28 March 2015

safar

दिन भर भटकते रहते हैं अरमान तुझ से मिलने के
न दिल ठहरता है न इंतज़ार रुकता है !!-saira
din bhar bhatkte rehte hain armaan tujh se milne ke,
na dil thehrta hai n intzaar rukta hai !!-saira


मत तलाश करो ...मंजिल कोई ....यूं ही सफ़र में रहो .....
हवा जैसा.... भटकते रहना भी कहाँ?... सब को नसीब होता है !! - saira
Mat talash karo manjil koi yun hi safar meinn rahoo....
hawa jaisa bhatkte rehna bhi kahaa sab ko naseeb hota hai !! -saira

कतल होते होते रह गया उन से आज ..
शुक्र है वो हथेलियों हिना देखते थे 
कहीं नज़र हम पे पड़ती तो काम तमाम था !!- saira

न जाने हादसे मेरी तलाश में हैं ?
या मैं हादसों की ताक़ में ???
या ख़ुदा ..... कोई पल तो हो जो कोई हादसा न हो !!- saira
na jane hadse meri talaash mein hain ? 
ya main haadson ki taak mein..?..
ya khuda .....koi pal to ho jo koi hadsa na ho !!- saira

किस्मत या करम ??

किस्मत का खेल कहते हैं लोग अपनी नाकामी और अपनी हर सक्सेस को भी
 इसी का सिला कह कर यह सेहरा भी बांध देते हैं अपनी किस्मत के सर!!
लेकिन ......क्या किस्मत ही के दम पे चलते हैं हम? दुनिया? या यह कायनात भी इसी की गुलाम है ??? 
ऐसा है तो क्यू करते हैं हम अपनी जनम पत्री पे यकीन .....क्यूँ उम्मीद नहीं टूटती ?क्यूँ नहीं मरता यकीन? अपने हाथ की लकीरों को मान लेते है वे टु सक्सेस और समझ लेते हैं शायद अपनी तक़दीर का मैप....मेहनत करना फिर भी हिस्सा है हमारा और करम करते रहना प्लान है, यानि की तय है ...नहीं तो किस्मत भी साथ नहीं देती ......ऐसा भी सुनते हैं और मज़े की बात मानते भी हैं...तो बहुत क्न्फ़ुसिंग है यह सब ....किस्मत या करम ??आखिर किस पे डेपेंड(depend) हैं इंसान का व्ज़ूद?-Saira

"शुक्रिया"

मुझे खुदा से कुछ कहना था अचानक राह चलते चलते याद आया था ..कोई फरिश्ता था मेरे दिल के बिल्कुल सामने जो मुझे शायद सुन पा रहा था और उसी की पाक सी खुशबू से महकी हुयी सी बारिश भी थी ..मोति की किसी माला के जैसे उसका नूर घर की खिड़की के शीशे से मुझे देख- देख के कोई मुस्कुरा रहा था , खुशी थी शायद जो हवा बन के मेरी तरफ हर तंग द्र्वजे की द्र्राद से मुझे छूने आ रही थी । और आज मुझे उस रब से मिलके कहना था .." ज़िंदा हु और शुक्रगुजार भी और उनके गले लगने का अरमान भी "अब यह अरमान पूरा कैसे होगा नहीं पता था !!फिर एक खामोशी ने मेरे कान मे कहा एक बार हाथ बढ़ा के तो देख वो जिसे कोई छू नहीं सकता, देख नहीं सकता, वो भेस बदल के आता है ज़रा सा गौर से देखने पे नज़र ज़रूर आता है ...और महसूस होने लगता है उसका वजूद तो बस आज मुझे शूकरीय अदा क्र्र्न ही था!!एक पल में ही मैं खुदा के घर के रास्ते को छोटा करते हुये पोहुंच ग्यी अपने फ्रीश्ते के सहारे ...लोबान की खुशबू मेरी रूह को महका रही थी, दरगाह के फूल उस दिन मेरी हथेली को और मुझे ज़र्द से सुर्ख कर रही थी !!उस शाम में भी दिन का एहसास शामिल था, जैसे कोई एक नहीं हर दुआ कबूल हो गई थी मैं सजदे में सर को झुका के खुदा की अता की नहमत को महसूस कर रही थी ....मेरे फ्रीश्ते के सजदे से हर दुआ मेरी तरफ आ रही थी .. मैं उस चोखट पे खुद को रब के बहुत करीब पा रही थी.अब से पहले मुझे हाथ उठाना तो आता था मगर मांगना नहीं आता था उस रोज़ मैं सब जैसे बिन मांगे पा रही थी , सब कह पा रही थी रब से बिन कुछ कहे, रूबरू एक दम आमने सामने ....शुक्र अलहुमदों लिलः!! शुक्रिया उस फ्रीश्ते का जिस ने इस बे-सकूँ को सकूँ से मिलवाया वो जाती मेरी जान को फिर दुनिया में ले आया "शूकरीया "!- saira

रोज़ चाँद को त्क़्ते त्क़्ते

रोज़ चाँद को त्क़्ते त्क़्ते लहरें नीली हो जाती हैं, नीली लहरें देख के दिन भर , धूप लाल सी हो जाती है,लाली से जलती है शायद फिर रात यह काली हो जाती है ,चिठी लिखने जिस पल बैठूँ .वो घड़ी यूं सदियाँ हो जाती है ..।सिरहाने में रखी चाये अक्सर शर्बत हो जाती है ...।दो शब्द लिखूँगी कल्म से अपनी सोच कुछ लिखने लगती हु ...।और मेरे लिखते लिखते के "तुम ठीक तो हो न?" प्यार की बातें कड़वी हो जाती हैं ..।इस वक़्त बताती घड़ी से पुछू? या तेरे कोलर को नोचू ? या कोई मुल्ला ,पंडित खोजू ?क्यूं कुछ दिन बाद मोहब्बत एक उलझन सी हो जाती है?? क्या लिखू अब नाम तुम्हारे? यह letter से कविता हो जाती हैं !कागज़ पे लिखी हर कविता अक्सर डाइरी में खो जाती है और फिर से चाँद को त्क़्ते त्क़्ते लहरें नीली हो जाती हैं,...........!!-saira

तु मुझे सोचता है

ऐस नही की उसको फ़िक्र नही मेरी
हाँ वो ख़ुदा है तो सब  का  सोचता है !

किस किस को अता कर दे वो दिल का क़रार ?
वो इबादत और शिद्दत का वजन तोलता है !

लाख छुपा ले इश्क़ तू सारी दुनिया से 
यह अज़ान बन के सारे शहर में कोंधता है !


सारी दुनिया अज़ीज़ उसको बस मेरे सिवा 
क्या  सितमग़र है वफ़ा की इन्तहा खोजता है !!

मेरी फ़िक्र न  कर मैं ज़िन्दा रहुंगा,
भला मर के भी कोई दम तोड़ता है !!

होसला ए सफीना देखों, हावा बदले  या पानी की रवां  ,
नाख़ुदा बिन भी  कभी लहरों पे डोलता है !!

कोइ वादा खिलाफी का इलज़ाम  नही तुझ पे
 मैं जनता हु जुदा हो के भी तु मुझे सोचता है! -सायरा

उम्मीद

सारा दिन गुज़रा अब  शाम की बात है
थकान हो चुकी अब आराम की बात है !
लेकिन मैं जानती हु ये  सब कहने की बात है,
दिन के पहर ने सताया था  
अब ख्वाबों के सताने की बात है !
मैंने दिन भर समझाया है दिल को शाम होने तक 
अब शाम को समझायेंगे रात के सकूं भरे पहर के  वास्ते !
चारो तरफ भागा है दीमाग मेरा अब आराम मांगता है 
अपनी रात के वास्ते  कोई अच्छा ठंडा  ख्वाब मांगता है !
मैं डर डर की रात के आने का इंतज़ार करती ,
मैं किसी ख्वाब के आने का  अरमान करती हु 
सुबह से फिर लग जायेगा झमेला दुनियादारी का 
चलो अभी कुछ पल आराम करती हु ...
हर दिन यही काम करती हु ... इसी
जद्दो ज़हद में जिंदगी तमाम करती हु !
थक जाती हु रोज़ , रोज़ आराम करती हु !
रोज़ खुद से झगडती हु,रोज़ रब से बात करती हु !!
जिंदा हु जमाने से  ये  सब से बड़ा काम करती हु ....!!-saira

Wednesday, 25 March 2015

अहसास

दोस्त कब दुश्मन लगने लगे कोई खबर नहीं 
आईना भी मुह चिडाऐ कभी… तो लोग उसे तोड़ देते हैं !!-saira


वाजिब है इश्क़ में मेरा तुझ पे फ़िदा होना ....
मगर खुद को खुदा समझा तो तेरी खता होगी !!-saira


कोई फैसला न कर मेरे चेहरे को देख के .....
एक चेहरा और है जो बस मेरा खुदा ही देखता है ... !! -saira



न मोहब्बतों को सकून, न नफरतों को आराम है
बा ख़ुदा इस दुनिया का खाना खराब है !! - saira
na mohabbton ko sakun , na nafrton ko aaraam hai ,
ba - khuda is duniya ka khana khraab hai !- saira



in love

हर लम्हां आज़ाद हैं जिंदगी का आज कल तेरे पहलु में ...
और लोग कहते हैं मैं गिरफ्तार हु इश्क में तेरे !-saira
har lamha aazaad hai zindgi ka aaj kal tere pehlu mein,
aur log kehte hain main girftaar hu ishq mein tare !!!- saira

बेशकीमती लोग

मेरी कलम से जब तुम कमल की तरहां 
कागजों पे उभरते हो, तब एहसास होने लगता है 
कुछ लोग कहीं रहें, किसी हाल हों ...
वो बस बेशकीमती होते हैं
और उनकी यादें किसी इबादत की तरह पाक़ !! -saira

hava

कभी सुनी हैं हवा में जो आवाजें बहती रहती है ....
मर जाते हैं सिर्फ लम्हें .. ...
और सदियाँ फ़साने कहती रहती हैं !! -saira

dua ki trhan

अब दिल भी धड़कता है तो शोर लगता है ..
उनकी खामोश आँखों में जब से घर बनाया है !!
अब तैरते रहते हैं ख़ुशी के आसुओं की तरहां
उन की आँखों में .... 
और चमकते रहते है किसी पुरी हुई दुआ की तरहा !! - saira

एक ही नज़र से देखता है!!.


मांग के देख कभी दिल से क्या चाहिए??
वो जो देने वाला है महज़ शिद्दत ही देखता है !!
नहीं देता कभी कुछ तो कोई बात नहीं
वो कारसाज़ हमारे अमल देखता है !!
दिया है सब को अपने हिस्से का इमान
वो अक्सर इमान की जान देखता है !!
ख़ुदा ने इश्क किया है सब से
हर फैसले में तेरी राजा देखता है !!
शिफ़ा दे देता है हर गम से हमे
वो जख्मों से रिसती दुआ देखता है !!
सब का इन्साफ उसी को करना है ,
वो कहाँ कोई छोटा बड़ा देखता है !!
लाख शिकायतें तुम खुदा से करो
वो तुम्हारे सजदे का वजन देखता है !!
कोई धर्म नहीं खुदा के प्यारों का
वो हर शय को एक ही नज़र से देखता है -saira
maang ke dekh kabhi dil se kya chaheye...??
vo jo dene wala hai mahaz shiddat hee dekhta hai ..!!
nahi deta kabhi kuch to koi baaat nahi
vo kaarsaaz hamare amal dekhta hai !!
diya hai sab ko apne hissey ka imaan,
vo aksar imaan ki jaan dekhta hai !!
khuda ne ishq kiya hai sab se,
haraisle mein teri raza dekhta hai !!
shifa de deta hai har gam se hume.
vo jakhmon se risti dua dekhta hai !!
sab ka insaaf usee ko karna hai
vo khaa koi chota bada dekhta hai !!
laakh shikayte tum khud se karo
vo tumhare sajdon ka vajan dekhta hai !!
koi dharam nahi khuda ke pyaaron ka ,
vo har shay ko ek hii nazar se dekhta hai !!-saira

dil

क्या कहु दिल से अब कुछ नहीं कहना 
इसने किस का कहा सुना है?... जो मेरी सुनेगा !! -saira

Monday, 16 March 2015

कुछ बाकी है !!

 कुछ बाकी है !!
इंतज़ाम और करो अभी मुझ में साँस बाकी है
मैं यूं ही फिजाओं में न रह जाऊ कहीं ...
मिटा दो मुझे  के मुझ में इमान  अभी  बाकी है !!

बे लिहाज़ दिल धडकता है तुम्हारे नाम से
कही पा ही   न जाऊ तुम्हें ....
कुछ करो ...बे करार दिल  और दिमाग अभी  बाकी है!!

मैंने थाम के रखी है कुछ हसीं यादें ..
उम्र गुजरी है और अभी कुछ और बाकी है
ये जिंदगी की रफ़्तार अब भी बाकी है ..!!

ता उम्र का तजुरबा  ले के बैठे हैं ....
साया करते हैं  साँस देते हैं  और तपश सहते  रहते हैं ....
इन पेड़ों पे परिंदों के कुछ मकान अब भी बाकी है !!

तोड़ दो  धागा हर एक रिश्ते का
कहीं फिर से जुड़ न कोई इंसान.. इंसान से
इस दुनिया में  इन्सना की पहचान अब भी बाकी है
 -saira