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Saturday, 28 March 2015

"शुक्रिया"

मुझे खुदा से कुछ कहना था अचानक राह चलते चलते याद आया था ..कोई फरिश्ता था मेरे दिल के बिल्कुल सामने जो मुझे शायद सुन पा रहा था और उसी की पाक सी खुशबू से महकी हुयी सी बारिश भी थी ..मोति की किसी माला के जैसे उसका नूर घर की खिड़की के शीशे से मुझे देख- देख के कोई मुस्कुरा रहा था , खुशी थी शायद जो हवा बन के मेरी तरफ हर तंग द्र्वजे की द्र्राद से मुझे छूने आ रही थी । और आज मुझे उस रब से मिलके कहना था .." ज़िंदा हु और शुक्रगुजार भी और उनके गले लगने का अरमान भी "अब यह अरमान पूरा कैसे होगा नहीं पता था !!फिर एक खामोशी ने मेरे कान मे कहा एक बार हाथ बढ़ा के तो देख वो जिसे कोई छू नहीं सकता, देख नहीं सकता, वो भेस बदल के आता है ज़रा सा गौर से देखने पे नज़र ज़रूर आता है ...और महसूस होने लगता है उसका वजूद तो बस आज मुझे शूकरीय अदा क्र्र्न ही था!!एक पल में ही मैं खुदा के घर के रास्ते को छोटा करते हुये पोहुंच ग्यी अपने फ्रीश्ते के सहारे ...लोबान की खुशबू मेरी रूह को महका रही थी, दरगाह के फूल उस दिन मेरी हथेली को और मुझे ज़र्द से सुर्ख कर रही थी !!उस शाम में भी दिन का एहसास शामिल था, जैसे कोई एक नहीं हर दुआ कबूल हो गई थी मैं सजदे में सर को झुका के खुदा की अता की नहमत को महसूस कर रही थी ....मेरे फ्रीश्ते के सजदे से हर दुआ मेरी तरफ आ रही थी .. मैं उस चोखट पे खुद को रब के बहुत करीब पा रही थी.अब से पहले मुझे हाथ उठाना तो आता था मगर मांगना नहीं आता था उस रोज़ मैं सब जैसे बिन मांगे पा रही थी , सब कह पा रही थी रब से बिन कुछ कहे, रूबरू एक दम आमने सामने ....शुक्र अलहुमदों लिलः!! शुक्रिया उस फ्रीश्ते का जिस ने इस बे-सकूँ को सकूँ से मिलवाया वो जाती मेरी जान को फिर दुनिया में ले आया "शूकरीया "!- saira

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