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Saturday, 28 March 2015

रोज़ चाँद को त्क़्ते त्क़्ते

रोज़ चाँद को त्क़्ते त्क़्ते लहरें नीली हो जाती हैं, नीली लहरें देख के दिन भर , धूप लाल सी हो जाती है,लाली से जलती है शायद फिर रात यह काली हो जाती है ,चिठी लिखने जिस पल बैठूँ .वो घड़ी यूं सदियाँ हो जाती है ..।सिरहाने में रखी चाये अक्सर शर्बत हो जाती है ...।दो शब्द लिखूँगी कल्म से अपनी सोच कुछ लिखने लगती हु ...।और मेरे लिखते लिखते के "तुम ठीक तो हो न?" प्यार की बातें कड़वी हो जाती हैं ..।इस वक़्त बताती घड़ी से पुछू? या तेरे कोलर को नोचू ? या कोई मुल्ला ,पंडित खोजू ?क्यूं कुछ दिन बाद मोहब्बत एक उलझन सी हो जाती है?? क्या लिखू अब नाम तुम्हारे? यह letter से कविता हो जाती हैं !कागज़ पे लिखी हर कविता अक्सर डाइरी में खो जाती है और फिर से चाँद को त्क़्ते त्क़्ते लहरें नीली हो जाती हैं,...........!!-saira

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