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Thursday, 30 April 2015

जलुस !!

हर हाल जीते  रहेंगे

ज़िद्द हैं जीने की तो  यूं ही जीते रहेंगे ...
हम गम खा लेंगे आँसू पीते  रहेंगे .
वो चाक करते रहेंगे  गिरेबान मेरा
हम मुफलसी  की धागो से सीते   रहेंगे .
कौन  रुकता, कौन मिटा  है किसी के लिए
हम भी तुझ से मिलते और बिछड़ते रहेंगे
कुछ पल नासूर हो जाते हैं  जिंदगी में कभी कभी
हम इन्ही  यादों को पालते पलोसते रहेंगे ..
कितना रोये कोई किसी के वास्ते ..
होने दो होते हैं  गर अलग ये रास्ते ...
हम इन रिश्ते नातों  का बोझ ढोते रहेंगे
हर हाल जीते  रहेंगे  !!-saira

मर्तबान इश्क़ का !!


 पुराने मर्तबान सा रखा  है  किसी ताख़ पर
तुम्हारा इश्क़ और मेरे कच्चे ख्व़ाबों का आचार सा
 जितना पुराना होता जा रहा है
उतनी ही लज्ज़त  बडती जा रही  है  ....
कुछ ख़ास ज़ज्बातों को जज़्ब कर लिया है इसं ने
इस मर्तबान से अब सोंधी सोधी खुशबू भी आती है
और चट्टकारे देता रहता मुझे इस ग़रीबी के आलम में
 जब एक सुखी चपाती सा चाँद जलाने आ जाता है
तब उस बर्तमान  से  एक टुकड़ा कच्चा ख्व़ाब
तुम्हारे बातों का नामक और छोटे छोटे लकिन बेश कीमती
लम्हों के मसाले औरून से रिसता ...वक़्त का
खट्टा  तीखा  तेल सब पुराने
स्वादों को चख लेती हु और  फिर से
इस रिश्तों के मर्तबान  को उसी ताख पे  रख देती हु
जहां से वो मुझे  मेरी आराम कुर्सी और  खिड़की से
 उसे तकते तकते मीठी नींद के आने का रास्ता साफ़  नज़र आता है !
तो इस उम्मीद से के ये जायका बना रहेगा ता उम्र
मैं इस मर्तबान को बड़ा सहेज के रख
देती हूँ  इसी ताख पर !!- saira

Tuesday, 28 April 2015

gulab जान

ये कैसा गुलाब  है जो अब तक महकता है
गुनगुनाता, ठुमकता और दिल जैसा धडकता
हमारे सीनों में आज तक और फिर  सदा के  लिये .....!!

कुछ भी न लिया तेरी कायनात से  या रब
बस एक कतरा नूर एक पायल और कुछ
नगमे जो जमाने को याद है ,,,,
मुझे महकने दो  सदा के लिये बस इत्ती सी फरियाद है
 ये  मेरा  फन है रूह  मेरी ...यही मेरी जान है !!!

Monday, 27 April 2015

शफाक़ दिल

एक टुकड़ा शफाक़ दिल का उछाला हैं मैंने तेरी तरफ
एक नज़र भर के आसमान को देख तो सही ....
ये जो नूर की बूँदें बरसाने वाला है
ये मेरा इश्क है कोई आब नहीं !!- saira
ek tukda shfaaq dil ka uchhala hai maine teri tarf
ek nazar bhar ke aasmaan ko dekh to sahi
ye jo noor ki boonden barsane wala hai
ye mera ishq hai ko aab nahi !!- sair

Thursday, 23 April 2015

गजेंद्र - किसान .... !


देश का अन्नदाता
एक किसान एक साधारण बाप
पुकारता रहा ...
उस के टूटे दिल की आवाज़ गुम होते होते
ख़ामोश हो गयी ....!!
नीम के कडवे पेड़ से झुल गया वो ...
जीवन की कडवाहट को तोल गया वो ..
न कुर्सी छोड़ी न भाषण के लय ही तोड़ी ..
और अन्नदाता किसान की जीवन डोर भी टूट गयी .......
मैं किस को कोसु किसको शराप दु
या एक एक कर के सब किसानों को वार दु
तुम्हारी सत्ता की जीत पर
कोई नहीं सुनता... किस की दुहाई दु ??
कहो न किस को पुकार लु
हद हैं देश के सत्ता वालो ....
क्या तुम को आज बधाई दु ???
भाषण नहीं उसे राशन की आस थी...
उसकी मरती आँखों को मदद की प्यास थी ....
आज भी भोजन कर पावोगे ??
क्या अब अपनी संवेदना का गीत दोहरा पावोगे??????
क्या वहाँ केवल नेता थे .??..क्या वहां कोई इंसान नहीं था ...
कोई सिपाही , कोई साधू ,क्या किसी का कोई
ईमान नहीं था ...???
हैरान किया है तुम सब ने मुझ को .....
शायद आज कोई भी भगवान नहीं था ,,,,,,,,!!!- saira

Monday, 20 April 2015

जल जल के कोयला हो गयी है रात देखो ...
ये जानती हैं मैं दिन भर तुम संग गुज़ारा है !! - saira

समर्पित कृष्ण - 5..

  समर्पित कृष्ण - 5..

न  आकाश  में जीवन मोरा  ,
न मैं  बसूं पताल
  हे मीरा.. मैं तोरे नयन का दीपक
घर मोरा  तुमरा  ह्रदय विशाल !!

का  ढूंढ़ों  यु नगरी नगरी ??
 तु मन  के भीतर  झाँक
का  मांगे तु का तो  को देदु ?
मुरली की सब धुन तुमरी हैं
तो के प्रीत  से  हम भये
घनशयाम !
 .
हे मीरा  मैं  तुम्हरा ही  हिस्सा
तुम्हरा प्रेम मेरीमन  इच्छा
बस मन को  भटकावो  नहीं
मैं और तुम  बस संग हैं यूं  ही
जीवन से पूर्व फिर मरण उपरान्त

एक प्राण एक  ह्रदय हैं हम तुम
ये मेरे मुरली और माखन
ये मेरे  गइया और गोपी
सब ही मो सों प्रेम करें हैं..
और मैं तुम मेरी भक्ति की पूरक
.....
मैं तुमरे आदर्शों का  दर्पण .
मो   को करो तुम  जीवन अर्पण ..
.मोरा  स्नेह और सब आशीष  तुम्हे हैं
मो सो जो तुम प्रीत हो  बांधे ..लो
कान्हा  भी  कर दिए समर्पण ..!! -saira




Sunday, 19 April 2015

तो लिखते रहते हैं

तो लिखते रहते हैं ......
लिखना एक कला है ? या बस शब्दों का हेर फेर ?
या लिखना वो है जो हम बोल् नहीं पाते ?.....
.या वो जो सोचते तो हैं पर मानते नहीं .?
..या मानते तो हैं पर चाहते हैं कोई और भी मान ले .....
लिखना कहने से आसान है क्या ??
शब्द कहाँ से आते हैं ?
भाव कहाँ से आते हैं?
ये सब दिल की उपज है क्या ?
या ख्यालों की खेती हमारे दीमाग में होती है ??
कभी कभी मैं लिख के सोचती हु.....
ये लिखा है? या लिखवाया गया है ?
कभी सोच के लिख देती हु कोई
lलम्हां जो अपनी छाप छोड़ गया
या वो सब जो मैं कागज़ पे नहीं
ज़िन्दगी में जीना चाहती हु...
ये सब शायद सब के साथ होता है कुछ कह पते हैं कुछ लिख देते हैं
लिखना एक जरिया है शायद इंसान के हर एह्साह को जी लेने का
प्यार, नफरत, ममता,अराधना, साधना, ,बल, छल,
क्रोध , पीड़ा,बिरहा , रूठने, मानाने  का
और भी न जाने कितने भाव....कितने भाव जो जी नहीं सकते हम
लेकिन वो जिंदा रहते हैं शब्दों में बंधे हुए ...किताबों में आज़ाद सदा के लिये
वक्त के साथ  ये  काले  अक्षर धुंधले नहीं पड़ते जीते  रहते हैं ...
तो लिखते रहते हैं !!- saira

वक्त से आगे

वक्त से आगे निकल जाती हूँ 
तब कहीं तुम तक पहुँचती हूँ ....
वक़्त का इंतज़ार करना अपने तो बस की बात नहीं !! -saira

होंसला

मुश्त भर मिट्टी से बनाया उस रब ने मुझे 
होंसला वो के सातों आसमान चीर दु
कोई खौफ नहीं या रब तु जो मेरे साथ हो 
मैं तिनके भर से कोई भी शमसीर मोड़ दु !

मिट्टी का पुतला हु

महज़ मिट्टी का एक पुतला हु वक्त की आंधी से बिखर जाऊंगा...
और मैं मिट्टी में भी मिला तो इसी फिज़ा में रह जाऊंगा 
फिर से उठूँगा और फिर से संवर जाऊंगा 
खुदा की करामात हु उसी में घुल जाऊंगा !!-saira

ishq

बा-अदब तेरा हर ज़ुल्म उठाया मैंने ...,
या इश्क़.. अब भी कहता है के रिश्ता नहीं निभाया मैंने? !!
बड़े एहतराम से क़त्ल तूने वफ़ा का किया ,
तेरे पहलु में जब गर्दन को झुकाया मैंने !!
थोडा तो भरम रख दिल ए नादान का
तझे पत्थर से खुदा भी बनाया मैंने !!
न दे सिला वफाओं को कोई गिला नहीं
तेरी उल्फत में देख खुद को भुलाया मैंने -saira

कृष्ण..या तुम !!? !!-4

कृष्ण..या तुम !!? !!
मो को तो संग प्रीत लगी है ,
सगरा जगत रहा बतियाए!
काहे तो को शाम पुकारू ,
मोरे नीलकंठ तो कैलाश समाए !!
काहे तुमरी धुन पे नाचु ,
काहे तो बिन बैन करू मैं !
चंद्रशेखर की प्रीत में उलझी ,
काहे मोरमुकुट को बाचु??
मैं जंगल में ध्यान लगाऊ
सर्प सों संग श्रृंगार सजाऊ
और तन पे मैं भसम रामाऊ
फिर काहे ...??
पीतामभर क्यूँ भावे मो को ?
मोर पंख और माखन सोहावे ?
"चंदरपाल " का भेस धरे हो वासुदेवा ?
हे "अनन्ता" तुम का मोहे ठगो हो
बन कान्हा , माधव, कृष्ण गवाल ?? !!- saira

Monday, 13 April 2015

कान्हा ....!! - 3

कान्हा ....!!
न  कछु रहा सुझाये कान्हा 
न  कछु देत देखाई ...
तो से बांधे मोह के धागे 
तो संग प्रीत लगाई .
कान्हा ....
दिन सोहत  न  भावे रैना 
पहनू तुमरे नाम का गहना 
का से कहूँ किन सो  मैं बोलु 
मोहे तो   तु ही देत सुनाई .
.कान्हा ..
तुम मेरे एकतारे में गूंजे 
बजे मंजीरा म्र्दंग भी बाजे 
पग में बांधे प्रीत के घुघर
हम तो सगरे  जगत में नाचें 
कान्हा ....
 तोहरी लीला  तुम ही जानो 
मैं तुमरी कदाग की गुडिया 
तुम ही मोरी सगरी दुनिया
तोरे नयन मोरी नगरिया !!
कान्हा ...
तुम कछु बोलत नहीं 
मैं दासी न रानी कोई 
भई मैं तुमरी ..
बस  एक गुजरिया !!!-saira

Thursday, 9 April 2015

कृष्ण-2

लिख लिख रही मिटाये 
"कान्हा" . मैं .मीरा अपना नाम
धरती पे लिखु
कभी गगन से बांधू
ह्रदय की पतंग विशाल
पात पात पे नाम तेहारा
फुल फुल में तेरी छाया
महिमा गावत जगत ये सारा
नाम रटत तेरा ..माधव
सांझ सवेरे मेरा ये इकतारा
पग में घुघर बाँध के नाचु
लाज छोड़ तेरी राह को बाचु
विष पी जाऊ अमृत लागे
बांधे तो संग प्रीत के धागे
केसर रंग में रंगा मेरा मन
श्रृंगार करू, और रास रचाऊ
में नाचू गाऊ संग तेहारे ...
तुम मेरे जीवन की नईया
तुम गवाल.. हम भय रे गईया
मैं मीरा तुम से ही मैं हूँ ..
और कोई दूजा न मोरा
मेरे मन में वास तेहारा
माधव, मोहन,कृष्ण , कन्हिया !!- saira

Tuesday, 7 April 2015

हम...!!

हम...!!
तु जब तु न रहे ..
और मैं... मैं न रहु...
तब हम रहेंगे सदा के लिये ....
दो दिल एक ताल में धड्केंगे 
वफ़ा के लिये ...
मेरा तुम्हार प्यार
जब हमारा होगा ...
ये खज़ान बनेगा जहां के लिये ...
तु मुझ से मैं तुझ से मिलते रहें
कोई सरहद न हो बस
खुदा के लिये ...
बहता रहें आब बन के
इबादत ए इश्क अपना
कोई प्यासा न रहे दिल की दुआ के लिए ...!! -saira

Monday, 6 April 2015

क्या क्या लिए फिरते हो !!



हज़ार ज़ख्म  लिए फिरते हो ....
गज़ब बात  है के अब भी दिल ही  लिए फिरते हो ..!
कौन सुनता  है यहाँ दिल के  किस्से ...
अजब  बात  है  के जुबान लिए फिरते हो ...!
कोई जुड़ता नहीं यहाँ किसी से ....
तु बे जा  तलवार  लिए  फिरते हो ..!
 ला इलाज़ होता इश्क मेरी जान ....
तुम फिर भी अरमान लिए फिरते  हो ....!
कोई खौफ नहीं अब यहाँ खुदाई का ..
तुम हो के ईमान  लिए फिरते हो ....!
दगा देते है यहाँ सितारे सारे...
तुम काहे उधारी  का  चाँद लिए फिरते हो ....!
दिलों की ग़ार में जब  अब तलक अँधेरा है
तुम  किस उम्मीद का चिराग़ लिए  फिरते हो ,!
बे वफाई, बे दिली, बे परवाही के ज़माने में ........
तुम क्या क्या  जीने के सामन लिये फिरते हो
 मुबारक के  जहाँ सब टूटा  फूटा  है ,
 तुम वहां पंख और परवाज़ लिए फिरते हो ???- saira

ishq

पीर बना बैठा है सारी दुनियां का ..
ये"इश्क़" न हुआ बवाल हुआ ..
एक ख़ुदा के हम सब आशिक़
और इश्क का आशिक़ खुदा हुआ !!- saira
खंडहर जिन्दा रहते है !!
खंडहर जीते रहते है अपनी जवानी को ..
मुसाफिर कहते सुनते हैं उनकी कहानी को ...
मगर ये दीवारें कभी हँसती कभी रोती सी लगती है ..
अपने ही किसी ख्व़ाब में सोती सी लगती है
तब लगता है इन्हें भी थाम ले कोई
न जाने कितनी सदियों का बोझ है इन पे ..
पत्थर का भी कोई दिल जरूर होता होगा ...
कुछ पुराना इन की भी आँख भीगोता होगा .......
कितने राज़ और अरमान दफन हैं इन की आहों में
हम सुन नहीं पाते ये कह नहीं सकते ...
बस जीते रहते हैं खामोश गिरते सम्भालते
अपने आगाज़ से अंजाम की हर कहानी को
खंडहर जिन्दा रहते है !! -saira

कृष्ण !!

कृष्ण !!
रैन गयी मोरा चैन न आया ....
दिवस गया रे सारा माधव ...
कौन संग तु रास रचाया ...??.
सब बेचैन मुरली न बाजी.
.तु का को जाके रैन जगाया ??
किन सौतन का भाग बनाया??
नयन का काजल और कला बदल
खूब बहा रे ...क्यूँ भला??
यु ही तेरे कारण..! .
मैं कब मांगू सारा प्रेम तेहारा?
मेरा प्रेम तो तु रहने दे रे मोरा
मैं तेरे चरणन की दासी
कौन कहे माथे लियो सजाए??
इतना बतलादे ...
मोहे तुमरे दिल से कौन
रहा बिसराए.....??
पग में घूंगर बाजत नाही
हार सिंगार भी भावत नहीं
कौन भेस ये हुआ मोरा
बिन मुरली “मीरा” न होवे
“ राधा” भी कहीं होवत नाही !!
अंगना मोरा भया है सुना..
और दुनियाभई विदेश ..
तुम जिस देश जावत हो कान्हा वो ही मोरा देश ..
सवप्न लोक इकतारा गूंजे ..
कहीं छाव तेरे मोर मुकुट की
मैं खोजू या तु मुझ को छु ले
कहे खेले खेल ....??
नयन भरे हैं ..रूप से तोरे!
कान में गुंजत तुमरा राग ...
इक तारा लेके इत उत डोलू
का धरती क्या आकाश ..
माधव मेरे मन से बहार आओ
मैं रूठू आज तुम आन मनवो ...
चित चोर भये तुम मन चोर भये हो
तुम बिन जीवन का कुछ काम नहीं है
इस षण आओ प्राण चुरा लो ...!!!!
कान्हा मोहे गले लगा लो ! - saira