पुराने मर्तबान सा रखा है किसी ताख़ पर
तुम्हारा इश्क़ और मेरे कच्चे ख्व़ाबों का आचार सा
जितना पुराना होता जा रहा है
उतनी ही लज्ज़त बडती जा रही है ....
कुछ ख़ास ज़ज्बातों को जज़्ब कर लिया है इसं ने
इस मर्तबान से अब सोंधी सोधी खुशबू भी आती है
और चट्टकारे देता रहता मुझे इस ग़रीबी के आलम में
जब एक सुखी चपाती सा चाँद जलाने आ जाता है
तब उस बर्तमान से एक टुकड़ा कच्चा ख्व़ाब
तुम्हारे बातों का नामक और छोटे छोटे लकिन बेश कीमती
लम्हों के मसाले औरून से रिसता ...वक़्त का
खट्टा तीखा तेल सब पुराने
स्वादों को चख लेती हु और फिर से
इस रिश्तों के मर्तबान को उसी ताख पे रख देती हु
जहां से वो मुझे मेरी आराम कुर्सी और खिड़की से
उसे तकते तकते मीठी नींद के आने का रास्ता साफ़ नज़र आता है !
तो इस उम्मीद से के ये जायका बना रहेगा ता उम्र
मैं इस मर्तबान को बड़ा सहेज के रख
देती हूँ इसी ताख पर !!- saira

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