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Monday, 13 April 2015

कान्हा ....!! - 3

कान्हा ....!!
न  कछु रहा सुझाये कान्हा 
न  कछु देत देखाई ...
तो से बांधे मोह के धागे 
तो संग प्रीत लगाई .
कान्हा ....
दिन सोहत  न  भावे रैना 
पहनू तुमरे नाम का गहना 
का से कहूँ किन सो  मैं बोलु 
मोहे तो   तु ही देत सुनाई .
.कान्हा ..
तुम मेरे एकतारे में गूंजे 
बजे मंजीरा म्र्दंग भी बाजे 
पग में बांधे प्रीत के घुघर
हम तो सगरे  जगत में नाचें 
कान्हा ....
 तोहरी लीला  तुम ही जानो 
मैं तुमरी कदाग की गुडिया 
तुम ही मोरी सगरी दुनिया
तोरे नयन मोरी नगरिया !!
कान्हा ...
तुम कछु बोलत नहीं 
मैं दासी न रानी कोई 
भई मैं तुमरी ..
बस  एक गुजरिया !!!-saira

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