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Monday, 6 April 2015

खंडहर जिन्दा रहते है !!
खंडहर जीते रहते है अपनी जवानी को ..
मुसाफिर कहते सुनते हैं उनकी कहानी को ...
मगर ये दीवारें कभी हँसती कभी रोती सी लगती है ..
अपने ही किसी ख्व़ाब में सोती सी लगती है
तब लगता है इन्हें भी थाम ले कोई
न जाने कितनी सदियों का बोझ है इन पे ..
पत्थर का भी कोई दिल जरूर होता होगा ...
कुछ पुराना इन की भी आँख भीगोता होगा .......
कितने राज़ और अरमान दफन हैं इन की आहों में
हम सुन नहीं पाते ये कह नहीं सकते ...
बस जीते रहते हैं खामोश गिरते सम्भालते
अपने आगाज़ से अंजाम की हर कहानी को
खंडहर जिन्दा रहते है !! -saira

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