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Thursday, 23 April 2015

गजेंद्र - किसान .... !


देश का अन्नदाता
एक किसान एक साधारण बाप
पुकारता रहा ...
उस के टूटे दिल की आवाज़ गुम होते होते
ख़ामोश हो गयी ....!!
नीम के कडवे पेड़ से झुल गया वो ...
जीवन की कडवाहट को तोल गया वो ..
न कुर्सी छोड़ी न भाषण के लय ही तोड़ी ..
और अन्नदाता किसान की जीवन डोर भी टूट गयी .......
मैं किस को कोसु किसको शराप दु
या एक एक कर के सब किसानों को वार दु
तुम्हारी सत्ता की जीत पर
कोई नहीं सुनता... किस की दुहाई दु ??
कहो न किस को पुकार लु
हद हैं देश के सत्ता वालो ....
क्या तुम को आज बधाई दु ???
भाषण नहीं उसे राशन की आस थी...
उसकी मरती आँखों को मदद की प्यास थी ....
आज भी भोजन कर पावोगे ??
क्या अब अपनी संवेदना का गीत दोहरा पावोगे??????
क्या वहाँ केवल नेता थे .??..क्या वहां कोई इंसान नहीं था ...
कोई सिपाही , कोई साधू ,क्या किसी का कोई
ईमान नहीं था ...???
हैरान किया है तुम सब ने मुझ को .....
शायद आज कोई भी भगवान नहीं था ,,,,,,,,!!!- saira

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