तो लिखते रहते हैं ......
लिखना एक कला है ? या बस शब्दों का हेर फेर ?
या लिखना वो है जो हम बोल् नहीं पाते ?.....
.या वो जो सोचते तो हैं पर मानते नहीं .?
..या मानते तो हैं पर चाहते हैं कोई और भी मान ले .....
लिखना कहने से आसान है क्या ??
शब्द कहाँ से आते हैं ?
भाव कहाँ से आते हैं?
ये सब दिल की उपज है क्या ?
या ख्यालों की खेती हमारे दीमाग में होती है ??
कभी कभी मैं लिख के सोचती हु.....
ये लिखा है? या लिखवाया गया है ?
कभी सोच के लिख देती हु कोई
lलम्हां जो अपनी छाप छोड़ गया
या वो सब जो मैं कागज़ पे नहीं
ज़िन्दगी में जीना चाहती हु...
ये सब शायद सब के साथ होता है कुछ कह पते हैं कुछ लिख देते हैं
लिखना एक जरिया है शायद इंसान के हर एह्साह को जी लेने का
प्यार, नफरत, ममता,अराधना, साधना, ,बल, छल,
क्रोध , पीड़ा,बिरहा , रूठने, मानाने का
और भी न जाने कितने भाव....कितने भाव जो जी नहीं सकते हम
लेकिन वो जिंदा रहते हैं शब्दों में बंधे हुए ...किताबों में आज़ाद सदा के लिये
वक्त के साथ ये काले अक्षर धुंधले नहीं पड़ते जीते रहते हैं ...
तो लिखते रहते हैं !!- saira
लिखना एक कला है ? या बस शब्दों का हेर फेर ?
या लिखना वो है जो हम बोल् नहीं पाते ?.....
.या वो जो सोचते तो हैं पर मानते नहीं .?
..या मानते तो हैं पर चाहते हैं कोई और भी मान ले .....
लिखना कहने से आसान है क्या ??
शब्द कहाँ से आते हैं ?
भाव कहाँ से आते हैं?
ये सब दिल की उपज है क्या ?
या ख्यालों की खेती हमारे दीमाग में होती है ??
कभी कभी मैं लिख के सोचती हु.....
ये लिखा है? या लिखवाया गया है ?
कभी सोच के लिख देती हु कोई
lलम्हां जो अपनी छाप छोड़ गया
या वो सब जो मैं कागज़ पे नहीं
ज़िन्दगी में जीना चाहती हु...
ये सब शायद सब के साथ होता है कुछ कह पते हैं कुछ लिख देते हैं
लिखना एक जरिया है शायद इंसान के हर एह्साह को जी लेने का
प्यार, नफरत, ममता,अराधना, साधना, ,बल, छल,
क्रोध , पीड़ा,बिरहा , रूठने, मानाने का
और भी न जाने कितने भाव....कितने भाव जो जी नहीं सकते हम
लेकिन वो जिंदा रहते हैं शब्दों में बंधे हुए ...किताबों में आज़ाद सदा के लिये
वक्त के साथ ये काले अक्षर धुंधले नहीं पड़ते जीते रहते हैं ...
तो लिखते रहते हैं !!- saira

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