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Friday, 19 June 2015

आँखे ....

आँखे ....
आंखे भी जुबान रखती हैं
कुछ ख्व़ाब और अरमान रखती हैं
कभी कभी आँखे सवाल रखती हैं
और कभी जवाब और ला जवाब रखती हैं
आँखे सब दिल में रखती है
ये जहन से दिल तक की परवाज़ रखती है
आँखे खुद  में शबाब रखती हैं
 न थमने वाले सैलाब रखती हैं
गिरती हैं संभलती हैं ...
 और कभी कहीं जा के  लड़ती हैं
अजब जलवा हैं आँखों का के   सब पे गौर करती हैं
 झुक जाती हया से जनिब ए महबूब ये आँखे
आँखे बा क़ायदा मोहब्बत का एहतराम रखती हैं
बन सवार के उठती हैं ....जिस दिन आँखे   काजल से ..
उस पल अपनी पलकों पे मौत का सामन रखती है
कभी खामोश रहती हैं
कभी चिल्ला के कहती हैं "हम  आँखे हैं
 हर जज़्बे कीज़ुबान रखती हैं !!-©saira

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