"जिंदगी" सिर्फ तुम्हारी है ....!!
कभी कभी ज़िन्दगी एक ऐसा खाली कमरा लगने लगती है जो अपने भीतर समेटे हुए हो ...कुछ पुरानी तस्वीरें जिस में कुछ पुराने रिश्ते और अज़ीज़ लम्हें जम गए हों
और दीवारें रिश्तों के रिसने से सीली पड़ गयी हों .... हर आवाज़ गुंजती रहती हो कभी लौट लौट के आती है अपनी ही सदा किसी अनसुनी दुआ की तरहां ..
खाली शीशा पे जमी धुल अपना ही चेहरा देखने नहीं देती !
.मकड़ी के जाले जैसे उलझा हुआ सा मन इस से बाहर नहीं आ पाता चाहे अनचाहे अटका रहता है वही जिंदगी के कोने में ...दिन रात का होना भी नहीं बदलता इस के भीतर की स्थिर हलचल को ...कोई खिड़की नहीं खुलती , कोई रोशनदान भी कोई किरण उम्मीद की अन्दर नहीं आने देता, door bell भी बजती है तो इस ख़ामोशी का शोर उसे सुनने नहीं देता ...मन के भीतर मचा शोर फ़ैल जाता है इस बंद कमरे में! कुछ नये परिंदे अपना आशियाना बनाने लगते है इस के बंद रोशनदान के कोनों में ...इस के भीतर बैठे हम सुन पाते हैं उन परिंदों का संघर्ष ... एक घोंसला बनाने का शोर , बारिश में पंख फडफडाने का शोर और फिर सुन पते हैं कुछ दिन बाद उन की जिंदगी में आई नई जिंदगी के चहचाहाने के मधुर आiवाज़ .......तब कभी लगता है उम्मीद कहीं भी पनप सकती है ...जिंदगी किसी हाल धड़क सकती है .....मगर ये कमरा जो हम खुद ही बंद कर लेते हैं
यकीन नहीं होने देता खुद पे ...खुद के वजुद पे ....और वो तब तक बंद रहता है जब तक खुद कुछ न किया जाए...जब तक किसी किरण की उम्मीद छोड़ कर एक दिया खुद न जलाया जाए...तब तक दिन नहीं होगा ...इंसान को तोड़ने में सब से बड़ा हाथ खुद उसके EMOTIONS की ही होता है ... हँसी ख़ुशी देते रहते हैं रिश्ते तो वो अपने लगते हैं और ज़रा बदले तो so called प्यार मोहब्ब्बत वफ़ा सब ख़तम लगने लगती है ....expectations स्वाभविक है और होनी भी चाहीये लेकिन हम खुद से उम्मीद करना भुल जाते हैं जब तब तकलीफ़ होती है जब खुद से जयादा अपने आस पास के लोगों और रिश्तों पे Depend होने लगते हैं तब हम गलने लगते हैं .... बंद कमरे की feeling जब कभी होने लगे तो खद को खुला छोड़ दो मन के भीतर के सब खिड़की दरवाज़े खोल दो ...मन बड़ा करो और माफ़ कर दो सब को और खुद को भी ..खुद की खातिर ... खुदा की नेहमत "जिंदगी" की खातिर जो सिर्फ तुम्हारी है .... जीते रहो जीना जरूरी है वजह तलाशते रहो क्यूँ की तुम्हारे होने का मतलब याद रहना जरूरी है !! - saira
कभी कभी ज़िन्दगी एक ऐसा खाली कमरा लगने लगती है जो अपने भीतर समेटे हुए हो ...कुछ पुरानी तस्वीरें जिस में कुछ पुराने रिश्ते और अज़ीज़ लम्हें जम गए हों
और दीवारें रिश्तों के रिसने से सीली पड़ गयी हों .... हर आवाज़ गुंजती रहती हो कभी लौट लौट के आती है अपनी ही सदा किसी अनसुनी दुआ की तरहां ..
खाली शीशा पे जमी धुल अपना ही चेहरा देखने नहीं देती !
.मकड़ी के जाले जैसे उलझा हुआ सा मन इस से बाहर नहीं आ पाता चाहे अनचाहे अटका रहता है वही जिंदगी के कोने में ...दिन रात का होना भी नहीं बदलता इस के भीतर की स्थिर हलचल को ...कोई खिड़की नहीं खुलती , कोई रोशनदान भी कोई किरण उम्मीद की अन्दर नहीं आने देता, door bell भी बजती है तो इस ख़ामोशी का शोर उसे सुनने नहीं देता ...मन के भीतर मचा शोर फ़ैल जाता है इस बंद कमरे में! कुछ नये परिंदे अपना आशियाना बनाने लगते है इस के बंद रोशनदान के कोनों में ...इस के भीतर बैठे हम सुन पाते हैं उन परिंदों का संघर्ष ... एक घोंसला बनाने का शोर , बारिश में पंख फडफडाने का शोर और फिर सुन पते हैं कुछ दिन बाद उन की जिंदगी में आई नई जिंदगी के चहचाहाने के मधुर आiवाज़ .......तब कभी लगता है उम्मीद कहीं भी पनप सकती है ...जिंदगी किसी हाल धड़क सकती है .....मगर ये कमरा जो हम खुद ही बंद कर लेते हैं
यकीन नहीं होने देता खुद पे ...खुद के वजुद पे ....और वो तब तक बंद रहता है जब तक खुद कुछ न किया जाए...जब तक किसी किरण की उम्मीद छोड़ कर एक दिया खुद न जलाया जाए...तब तक दिन नहीं होगा ...इंसान को तोड़ने में सब से बड़ा हाथ खुद उसके EMOTIONS की ही होता है ... हँसी ख़ुशी देते रहते हैं रिश्ते तो वो अपने लगते हैं और ज़रा बदले तो so called प्यार मोहब्ब्बत वफ़ा सब ख़तम लगने लगती है ....expectations स्वाभविक है और होनी भी चाहीये लेकिन हम खुद से उम्मीद करना भुल जाते हैं जब तब तकलीफ़ होती है जब खुद से जयादा अपने आस पास के लोगों और रिश्तों पे Depend होने लगते हैं तब हम गलने लगते हैं .... बंद कमरे की feeling जब कभी होने लगे तो खद को खुला छोड़ दो मन के भीतर के सब खिड़की दरवाज़े खोल दो ...मन बड़ा करो और माफ़ कर दो सब को और खुद को भी ..खुद की खातिर ... खुदा की नेहमत "जिंदगी" की खातिर जो सिर्फ तुम्हारी है .... जीते रहो जीना जरूरी है वजह तलाशते रहो क्यूँ की तुम्हारे होने का मतलब याद रहना जरूरी है !! - saira

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