कहीं यूँ न हो !!
ये जो तुम रोज़ इतरा के कहते हो के" मसरूफ हु मैं" ....
ये रिवायत एक दिन कही तनहा न कर दे तुम्हें मेरे रूठ ने के बाद!!
यु तो रोज़ रुठते हो, रोज़ मना भी लेते हैं हम तुम्हें,
तुम को बर्बाद ही न कर दें कहीं दिल टूटने के बाद !!
तुम से रोज़ बे-जः गुजारिशें जो मैं करता हु मेरे कमजोरी न समझ,
दिल कहीं पत्थर न हो जाए ये सिलसला छूटने के बाद !!
तमाम उम्र इंतज़ार की उम्मीद है तुझे मुझ से मगर ,
तू क्यूँ रंग बदलता है इस मुक्तसर से विसाल ही के बाद ??& ~saira(c)
