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Wednesday, 15 June 2016

कहीं यूँ न हो !!

कहीं यूँ न हो !!

ये जो तुम रोज़ इतरा के कहते हो के" मसरूफ हु मैं" ....
ये रिवायत एक दिन कही तनहा न कर दे तुम्हें मेरे रूठ ने के बाद!!

यु तो रोज़ रुठते हो, रोज़ मना भी लेते हैं हम तुम्हें,
तुम को बर्बाद ही न कर दें कहीं दिल टूटने के बाद !!

तुम से रोज़ बे-जः गुजारिशें जो मैं करता हु मेरे कमजोरी न समझ,
दिल कहीं पत्थर न हो जाए ये सिलसला छूटने के बाद !!

तमाम उम्र इंतज़ार की उम्मीद है तुझे मुझ से मगर ,
तू क्यूँ रंग बदलता है इस मुक्तसर से विसाल ही के बाद ??&       ~saira(c)

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