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Monday, 13 April 2015

कान्हा ....!! - 3

कान्हा ....!!
न  कछु रहा सुझाये कान्हा 
न  कछु देत देखाई ...
तो से बांधे मोह के धागे 
तो संग प्रीत लगाई .
कान्हा ....
दिन सोहत  न  भावे रैना 
पहनू तुमरे नाम का गहना 
का से कहूँ किन सो  मैं बोलु 
मोहे तो   तु ही देत सुनाई .
.कान्हा ..
तुम मेरे एकतारे में गूंजे 
बजे मंजीरा म्र्दंग भी बाजे 
पग में बांधे प्रीत के घुघर
हम तो सगरे  जगत में नाचें 
कान्हा ....
 तोहरी लीला  तुम ही जानो 
मैं तुमरी कदाग की गुडिया 
तुम ही मोरी सगरी दुनिया
तोरे नयन मोरी नगरिया !!
कान्हा ...
तुम कछु बोलत नहीं 
मैं दासी न रानी कोई 
भई मैं तुमरी ..
बस  एक गुजरिया !!!-saira

Thursday, 9 April 2015

कृष्ण-2

लिख लिख रही मिटाये 
"कान्हा" . मैं .मीरा अपना नाम
धरती पे लिखु
कभी गगन से बांधू
ह्रदय की पतंग विशाल
पात पात पे नाम तेहारा
फुल फुल में तेरी छाया
महिमा गावत जगत ये सारा
नाम रटत तेरा ..माधव
सांझ सवेरे मेरा ये इकतारा
पग में घुघर बाँध के नाचु
लाज छोड़ तेरी राह को बाचु
विष पी जाऊ अमृत लागे
बांधे तो संग प्रीत के धागे
केसर रंग में रंगा मेरा मन
श्रृंगार करू, और रास रचाऊ
में नाचू गाऊ संग तेहारे ...
तुम मेरे जीवन की नईया
तुम गवाल.. हम भय रे गईया
मैं मीरा तुम से ही मैं हूँ ..
और कोई दूजा न मोरा
मेरे मन में वास तेहारा
माधव, मोहन,कृष्ण , कन्हिया !!- saira

Tuesday, 7 April 2015

हम...!!

हम...!!
तु जब तु न रहे ..
और मैं... मैं न रहु...
तब हम रहेंगे सदा के लिये ....
दो दिल एक ताल में धड्केंगे 
वफ़ा के लिये ...
मेरा तुम्हार प्यार
जब हमारा होगा ...
ये खज़ान बनेगा जहां के लिये ...
तु मुझ से मैं तुझ से मिलते रहें
कोई सरहद न हो बस
खुदा के लिये ...
बहता रहें आब बन के
इबादत ए इश्क अपना
कोई प्यासा न रहे दिल की दुआ के लिए ...!! -saira

Monday, 6 April 2015

क्या क्या लिए फिरते हो !!



हज़ार ज़ख्म  लिए फिरते हो ....
गज़ब बात  है के अब भी दिल ही  लिए फिरते हो ..!
कौन सुनता  है यहाँ दिल के  किस्से ...
अजब  बात  है  के जुबान लिए फिरते हो ...!
कोई जुड़ता नहीं यहाँ किसी से ....
तु बे जा  तलवार  लिए  फिरते हो ..!
 ला इलाज़ होता इश्क मेरी जान ....
तुम फिर भी अरमान लिए फिरते  हो ....!
कोई खौफ नहीं अब यहाँ खुदाई का ..
तुम हो के ईमान  लिए फिरते हो ....!
दगा देते है यहाँ सितारे सारे...
तुम काहे उधारी  का  चाँद लिए फिरते हो ....!
दिलों की ग़ार में जब  अब तलक अँधेरा है
तुम  किस उम्मीद का चिराग़ लिए  फिरते हो ,!
बे वफाई, बे दिली, बे परवाही के ज़माने में ........
तुम क्या क्या  जीने के सामन लिये फिरते हो
 मुबारक के  जहाँ सब टूटा  फूटा  है ,
 तुम वहां पंख और परवाज़ लिए फिरते हो ???- saira

ishq

पीर बना बैठा है सारी दुनियां का ..
ये"इश्क़" न हुआ बवाल हुआ ..
एक ख़ुदा के हम सब आशिक़
और इश्क का आशिक़ खुदा हुआ !!- saira
खंडहर जिन्दा रहते है !!
खंडहर जीते रहते है अपनी जवानी को ..
मुसाफिर कहते सुनते हैं उनकी कहानी को ...
मगर ये दीवारें कभी हँसती कभी रोती सी लगती है ..
अपने ही किसी ख्व़ाब में सोती सी लगती है
तब लगता है इन्हें भी थाम ले कोई
न जाने कितनी सदियों का बोझ है इन पे ..
पत्थर का भी कोई दिल जरूर होता होगा ...
कुछ पुराना इन की भी आँख भीगोता होगा .......
कितने राज़ और अरमान दफन हैं इन की आहों में
हम सुन नहीं पाते ये कह नहीं सकते ...
बस जीते रहते हैं खामोश गिरते सम्भालते
अपने आगाज़ से अंजाम की हर कहानी को
खंडहर जिन्दा रहते है !! -saira

कृष्ण !!

कृष्ण !!
रैन गयी मोरा चैन न आया ....
दिवस गया रे सारा माधव ...
कौन संग तु रास रचाया ...??.
सब बेचैन मुरली न बाजी.
.तु का को जाके रैन जगाया ??
किन सौतन का भाग बनाया??
नयन का काजल और कला बदल
खूब बहा रे ...क्यूँ भला??
यु ही तेरे कारण..! .
मैं कब मांगू सारा प्रेम तेहारा?
मेरा प्रेम तो तु रहने दे रे मोरा
मैं तेरे चरणन की दासी
कौन कहे माथे लियो सजाए??
इतना बतलादे ...
मोहे तुमरे दिल से कौन
रहा बिसराए.....??
पग में घूंगर बाजत नाही
हार सिंगार भी भावत नहीं
कौन भेस ये हुआ मोरा
बिन मुरली “मीरा” न होवे
“ राधा” भी कहीं होवत नाही !!
अंगना मोरा भया है सुना..
और दुनियाभई विदेश ..
तुम जिस देश जावत हो कान्हा वो ही मोरा देश ..
सवप्न लोक इकतारा गूंजे ..
कहीं छाव तेरे मोर मुकुट की
मैं खोजू या तु मुझ को छु ले
कहे खेले खेल ....??
नयन भरे हैं ..रूप से तोरे!
कान में गुंजत तुमरा राग ...
इक तारा लेके इत उत डोलू
का धरती क्या आकाश ..
माधव मेरे मन से बहार आओ
मैं रूठू आज तुम आन मनवो ...
चित चोर भये तुम मन चोर भये हो
तुम बिन जीवन का कुछ काम नहीं है
इस षण आओ प्राण चुरा लो ...!!!!
कान्हा मोहे गले लगा लो ! - saira