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Friday, 15 May 2015

कृष्ण-१०

कृष्ण-१०
कित जाऊ कित बसूं रे कान्हा
कौन डगर मैं तो सों मिल लु ?
सारी श्रृष्टि तुमरी रचना
सब प्राणी में  प्राण तुम्हारा  ....
मेरा  प्राण और सम्मान
तुम्ही हो ....फिर
काहे तो को खोजत हु जग में ?
काहे तुमरी तृष्णा है  मो को ?
मेरे ही भीतर से बोलो ...तुम कान्हा
मेरे स्वर  में तुमरी वाणी
मैं  इत्ती सी बात न जानी
हुई फिरू खुद से अनजानी
लोग कहें मो को बावली तोरी
तुमरे हाथ  ये जीवन डोरी ....
मेरे मन के भीतर हो तुम  ..
तुम जानो सगरे जगत के  मन की
हे माधव, हे कान्हा  हे अंतर्यामी .......!!-saira ©

Wednesday, 13 May 2015

ताल्लुक़

सुनों तुम ताल्लुक़ टूटने का ......
ज़िक्र कहीं नही करना ........
हम लोगों से कह देंगे .....
.हमें फ़ुर्सत नही मिलती दुनिया के झमेलों से !!- -saira ©

कृष्ण -9

कृष्ण -9
कहाँ रहे तुम सगरी रैना ..
कहाँ भये तुम हे घनश्याम 
जावो मैं तो सों न बोलु 
लाख पड़ो तुम हमरे पाँव ....
दीप जलाए नैनों का
पूजन का पुष्प सजाये..
मैं जागी , एक तारा जगा
कान्हा तुम न आये ...
कान्हा हम गोवर्धन पहुंचे
जमुना तट तेरी ख़ोज को आये
हम तुमरी गईया से पुछे
और नाचत रहे मयूर से पुछे ...
जग हँसे सब करें ठिठोली
मैं तुम बिन सगरा जग डोली
रूठू तो से तो से ही मानु
तुमरी न जानु मैं
तो बस तुमरी ही हो ली !!-saira ©

Monday, 11 May 2015

कृष्ण...8


जग तज दु या जोग मैं छोरु ?
भजन करू के मुख भोग सों मोरू ?
मैं का कोई श्रृंगार सजाऊ?
या तुमरी मुरली बन जाऊ ...?
माधव हम तुमरी ही माटी
फिर कहे कोई नाम धराऊ ???
न रूप , कछु रंग न मोरा
पवन हु तेरी मुरली में गाऊं...
श्वास भरू तो तोहे पी लु ..
फिर विष सों काहे डर जाऊ ...??
प्राण हो मोरा लगन हो मोरी ...
जल भी तुम और अगन हो मोरी ..
कान्हा तु जग को समझाओ ..
जोग ये मोरा रोग नहीं है ...
मैं तृप्ता तु पालनहारा
सत्य है ये संजोग नहीं है
काहे कौन कसोटी परखे
मैं तुम ही हो कोई और नहीं है
मैं तुम से ,तुम मो से कान्हा ..
हमरा कौनो ओर छोर नहीं है ! saira ©

Sunday, 10 May 2015

कृष्ण..7

कृष्ण..7
कहीं अगर मैं मीरा होती ,
कान्हा.. तुम मोरा एक तारा होते !
कहीं अगर मैं राधा होती,
रूप मोरा ... तुम कान्हा होते !
मैं कहीं अगर सुदामा होती
तुम मोरी प्रीत और स्नेह ही होते ....!
कान्हा मैं जो तुमरी मईया होती
तुम  मोरी परछाई होते ....!
कान्हा ... का होता जो अर्जुन होती ..
कर्म मेरा तुम धर्म ही  होते ....
कछु कहो कान्हा मैं तुमरे युग में जो होती ?
का  होती ? या न  होती ?
मोर मुकुट का पंख  जो होती ?
या तुमरा पीताम्बर होती ..?
माटी की गगरीयां  होती ?
कौनो  राग या ठुमरी होती ?
जो भी  होती मैं तुमरी ही होती ....
तुमरी ही कोई  लीला होती ....
मीरा होती अगर मैं कान्हा
तु अमृत मैं विष ही होती ...! saira ©

Saturday, 9 May 2015

कृष्ण - 6

कृष्ण 
काहे लिखूं मैं प्रीत की पतियाँ 
तुम तो हो मेरे मन बसिया ..,
मोरे मन की तुम ही जाणों
हँसी करे तो करे सगरी सखियाँ ,
मैं तो तुमरे नयन का काजल
जगत में ढूंढे मो को संसार ये पागल ,
इन चरणन के धूल हूँ माधव..
और तुम कुंदन दियो बनाये ...
चले ब्रह्मांड तुम जो करो इशारा
तार दियो तुम ही जग सारा
गिरधर तुम मोरा मन बाँचो ..
देखो हमरी प्रीत न जांचो
आप ही रूठे.आप ही माने
तुमरी प्रीत कौन धागों संग बांधे !!-saira

Saturday, 2 May 2015

हर हाल जीते रहेंगे

हर हाल जीते  रहेंगे

ज़िद्द हैं जीने की तो  यूं ही जीते रहेंगे ...
हम गम खा लेंगे आँसू पीते  रहेंगे .
वो चाक करते रहेंगे  गिरेबान मेरा
हम मुफलसी  की धागो से सीते   रहेंगे .
कौन  रुकता, कौन मिटा  है किसी के लिए
हम भी तुझ से मिलते और बिछड़ते रहेंगे
कुछ पल नासूर हो जाते हैं  जिंदगी में कभी कभी
हम इन्ही  यादों को पालते पलोसते रहेंगे ..
कितना रोये कोई किसी के वास्ते ..
होने दो होते हैं  गर अलग ये रास्ते ...
हम इन रिश्ते नातों  का बोझ ढोते रहेंगे
हर हाल जीते  रहेंगे  !!-saira