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Friday, 15 May 2015

कृष्ण-१०

कृष्ण-१०
कित जाऊ कित बसूं रे कान्हा
कौन डगर मैं तो सों मिल लु ?
सारी श्रृष्टि तुमरी रचना
सब प्राणी में  प्राण तुम्हारा  ....
मेरा  प्राण और सम्मान
तुम्ही हो ....फिर
काहे तो को खोजत हु जग में ?
काहे तुमरी तृष्णा है  मो को ?
मेरे ही भीतर से बोलो ...तुम कान्हा
मेरे स्वर  में तुमरी वाणी
मैं  इत्ती सी बात न जानी
हुई फिरू खुद से अनजानी
लोग कहें मो को बावली तोरी
तुमरे हाथ  ये जीवन डोरी ....
मेरे मन के भीतर हो तुम  ..
तुम जानो सगरे जगत के  मन की
हे माधव, हे कान्हा  हे अंतर्यामी .......!!-saira ©

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