जग तज दु या जोग मैं छोरु ?
भजन करू के मुख भोग सों मोरू ?
मैं का कोई श्रृंगार सजाऊ?
या तुमरी मुरली बन जाऊ ...?
माधव हम तुमरी ही माटी
फिर कहे कोई नाम धराऊ ???
न रूप , कछु रंग न मोरा
पवन हु तेरी मुरली में गाऊं...
श्वास भरू तो तोहे पी लु ..
फिर विष सों काहे डर जाऊ ...??
प्राण हो मोरा लगन हो मोरी ...
जल भी तुम और अगन हो मोरी ..
कान्हा तु जग को समझाओ ..
जोग ये मोरा रोग नहीं है ...
मैं तृप्ता तु पालनहारा
सत्य है ये संजोग नहीं है
काहे कौन कसोटी परखे
मैं तुम ही हो कोई और नहीं है
मैं तुम से ,तुम मो से कान्हा ..
हमरा कौनो ओर छोर नहीं है ! saira ©

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