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Thursday, 22 October 2015

जगह्साई!!

जगह्साई!!
मेहमान अब भगवान नही है 
कोई कलम अबआज़ाद नही है 
कोई दलित अबबचने न पाये
देखो कोई अब दाल तक न खाए
हिंद के वारिस अब केवल हिंदू
मुसलमान अब घर अपने जाए
जितने धर्म हों अब उतने दंगे
फिर्कोँ में हम को अब बाँटा जाए
लुट लो खुद हीअब चैन अमन तुम
काहे कोई बाहर से आए??
जात पे काटो अब रंग पे बाँटो
आग लगा दो वतन को सारे
याद रहे ओ सत्ता वालो अब
बस कुर्सी न ये जलने पाए
देश को देदो दिशा नई तुम
दुख दिल से न जाने पाए
फिर भी एक निवेदन तुम से
रोक सको तो रोको ये मनचन
बंद करो अब विश का लंगर
गरिमा भंग न होने पाए
जगह्साई न होने पाए!!-saira© 

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