Powered By Blogger

Thursday, 22 October 2015

गुलज़ार ख्वाब था

कल का ख्वाब गुलज़ार ख्वाब था
कल रात का ख्वाब तुम्हारा ख्वाब
दिया जला रहे थे तेज़ हवा मे तुम
मुझे देख के तुम मुस्काये ,पास बुलाये
और कुछ कच्चे बेर खिलयए....
भीनी सी मुस्कान तुम्हारी ...
गुनगुनाता हुआ चाँदनी का दोशला
पेहने मेरे साथ चले जा रहे थे
लहरों के शोर में भी तुम कुछ कहे जा रहे थे
हम दोनो लहरों के किनारे चाँद की मधम
रोशनी में शायद सितारे गिने चले जा रहे थे
और कभी लगा मुझे तुम कोई गीत बुने जा रहे थे
सारी रात महकी हैं आंखे तुम चंदन से बहे जा रहे थे.....
कल ख्वाब गुलज़ार ख्वाब था
काश हक़ीकत हो जाए
मेरी तुम से मिलने का अरमान भी पुरा हो जाए!!-saira©

No comments:

Post a Comment